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Urdu Shayari In Hindi 70+ Urdu Mohabbat Shayari In Hindi

Urdu Shayari In Hindi 



अँधेरी रात को मैं रोज़ – ए – इश्क़ समझा था

चराग़ तू ने जलाया तो दिल बुझा मेरा

* रोज़ – ए – इश्क़ – प्यार का दिन




आईना छोड़ के देखा किए सूरत मेरी

दिल – ए – मुज़्तर ने मिरे उन को सँवरने न दिया

दिल – ए – मुज़्तर – चिंतित




आबादी भी देखी है वीराने भी देखे हैं

जो उजड़े और फिर न बसे दिल वो निराली बस्ती है




आदमी आदमी से मिलता है

दिल मगर कम किसी से मिलता है




आग़ाज़ – ए – मोहब्बत का अंजाम बस इतना है

जब दिल में तमन्ना थी अब दिल ही तमन्ना है



आप पहलू में जो बैठें तो सँभल कर बैठें

दिल – ए – बेताब को आदत है मचल जाने की

* दिल – ए – बेताब – बेचैन दिल



आरज़ू वस्ल की रखती है परेशाँ क्या क्या

क्या बताऊँ कि मेरे दिल में है अरमाँ क्या क्या

* आरज़ू – लालसा



इक बात कहें तुम से ख़फ़ा तो नहीं होगे

पहलू में हमारे दिल – ए – मुज़्तर नहीं मिलता

* दिल – ए – मुज़्तर – चिंतित



इश्क़ की चोट का कुछ दिल पे असर हो तो सही

दर्द कम हो या ज़ियादा हो मगर हो तो सही




कमरे वीराँ आँगन ख़ाली फिर ये कैसी आवाज़े

शायद मेरे दिल की धड़कन चुनी है इन दीवारों में



कपड़े सफ़ेद धो के जो पहने तो क्या हुआ

धोना वही जो दिल की सियाही को धोइए



क्या रश्क है कि एक का है एक मुद्दई

तुम दिल में हो तो दर्द हमारे जिगर में है

* रश्क  




अब तो ख़ुशी का ग़म है न ग़म की ख़ुशी मुझे

बे – हिस बना चुकी है बहुत ज़िंदगी मुझे



आशोब – ए – इज़्तिराब में खटका जो है तो ये

ग़म तेरा मिल न जाए ग़म – ए – रोज़गार में



अगर मौजें डुबो देतीं तो कुछ तस्कीन हो जाती

किनारों ने डुबोया है मुझे इस बात का ग़म है

तस्कीन – सांत्वना



अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे

तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे



इलाही एक ग़म – ए – रोज़गार क्या कम था

कि इश्क़ भेज दिया जान – ए – मुब्तला के लिए

ग़म – ए – रोज़गार – जीविका का दुख




कर रहा था ग़म – ए – जहाँ का हिसाब

आज तुम याद बे – हिसाब आए



कौन किसी का ग़म खाता है

कहने को ग़म – ख़्वार है दुनिया




किस तरह अपनी मोहब्बत की मैं तकमील करूँ

ग़म – ए – हस्ती भी तो शामिल है ग़म-ए-यार के साथ



कोई इक ज़ाइक़ा नहीं मिलता

ग़म में शामिल ख़ुशी सी रहती है 



क्या कहूँ किस तरह से जीता हूँ

ग़म को खाता हूँ आँसू पीता हूँ



क़ैद – ए – हयात ओ बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं

मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँ 



क़िस्सा – ए – मजनूँ पसंद – ए – ख़ातिर जानाना है

वर्ना ख़्वाब – आवर तो अपने ग़म का भी अफ़्साना है 



उल्फ़त का है मज़ा कि असर ग़म भी साथ हों

तारीकियाँ भी साथ रहें रौशनी के साथ 




उन का ग़म उन का तसव्वुर उन के शिकवे अब कहाँ

अब तो ये बातें भी ऐ दिल हो गईं आई गई

शिकवे – शिकायत 




उन का ग़म उन का तसव्वुर उन की याद

कट रही है ज़िंदगी आराम से

तसव्वुर – कल्पना 




उसे भी जाते हुए तुम ने मुझ से छीन लिया

तुम्हारा ग़म तो मिरी आरज़ू का ज़ेवर था 




ग़म अगरचे जाँ-गुसिल है प कहाँ बचें कि दिल है

ग़म – ए – इश्क़ गर न होता ग़म – ए – रोज़गार होता

अगरचे – हालांकि 




ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ न महसूस हो जहाँ

मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया 




ग़म अज़ीज़ों का हसीनों की जुदाई देखी

देखें दिखलाए अभी गर्दिश – ए – दौराँ क्या क्या 




ग़म दे गया नशात – ए – शनासाई ले गया

वो अपने साथ अपनी मसीहाई ले गया

मसीहाई – मसीह की चमत्कारी शक्तियां



ग़म है आवारा अकेले में भटक जाता है

जिस जगह रहिए वहाँ मिलते – मिलाते रहिए 

रहिए – रहना




ग़म की तौहीन न कर ग़म की शिकायत कर के

दिल रहे या न रहे अज़मत-ए-ग़म रहने दे

अज़मत-ए-ग़म – दुख की महिमा


Dard-E-Muskil Shayari 



ग़म मुझे देते हो औरों की ख़ुशी के वास्ते

क्यूँ बुरे बनते हो तुम नाहक़ किसी के वास्ते 




ग़म मुझे ना – तवान रखता है

इश्क़ भी इक निशान रखता है

ना – तवान – कमज़ोर 



ग़म से एहसास का आईना जिला पाता है

और ग़म सीखे है आ कर ये सलीक़ा मुझ से 





ग़म से नाज़ुक ज़ब्त – ए – ग़म की बात है

ये भी दरिया है मगर ठहरा हुआ

ज़ब्त – ए – ग़म – सहनशीलता





ग़म से निस्बत है जिन्हें ज़ब्त – ए – अलम करते हैं

अश्क को ज़ीनत – ए – दामाँ नहीं होने देते 





ग़म – ए – हबीब नहीं कुछ ग़म – ए – जहाँ से अलग

ये अहल – ए – दर्द ने क्या मसअले उठाए हैंअँधेरी रात को मैं रोज़ – ए – इश्क़ समझा था

चराग़ तू ने जलाया तो दिल बुझा मेरा

* रोज़ – ए – इश्क़ – प्यार का दिन




आईना छोड़ के देखा किए सूरत मेरी

दिल – ए – मुज़्तर ने मिरे उन को सँवरने न दिया

दिल – ए – मुज़्तर – चिंतित




आबादी भी देखी है वीराने भी देखे हैं

जो उजड़े और फिर न बसे दिल वो निराली बस्ती है




आदमी आदमी से मिलता है

दिल मगर कम किसी से मिलता है




आग़ाज़ – ए – मोहब्बत का अंजाम बस इतना है

जब दिल में तमन्ना थी अब दिल ही तमन्ना है



आप पहलू में जो बैठें तो सँभल कर बैठें

दिल – ए – बेताब को आदत है मचल जाने की

* दिल – ए – बेताब – बेचैन दिल



आरज़ू वस्ल की रखती है परेशाँ क्या क्या

क्या बताऊँ कि मेरे दिल में है अरमाँ क्या क्या

* आरज़ू – लालसा



इक बात कहें तुम से ख़फ़ा तो नहीं होगे

पहलू में हमारे दिल – ए – मुज़्तर नहीं मिलता

* दिल – ए – मुज़्तर – चिंतित



इश्क़ की चोट का कुछ दिल पे असर हो तो सही

दर्द कम हो या ज़ियादा हो मगर हो तो सही




कमरे वीराँ आँगन ख़ाली फिर ये कैसी आवाज़े

शायद मेरे दिल की धड़कन चुनी है इन दीवारों में



कपड़े सफ़ेद धो के जो पहने तो क्या हुआ

धोना वही जो दिल की सियाही को धोइए



क्या रश्क है कि एक का है एक मुद्दई

तुम दिल में हो तो दर्द हमारे जिगर में है

* रश्क  




अब तो ख़ुशी का ग़म है न ग़म की ख़ुशी मुझे

बे – हिस बना चुकी है बहुत ज़िंदगी मुझे



आशोब – ए – इज़्तिराब में खटका जो है तो ये

ग़म तेरा मिल न जाए ग़म – ए – रोज़गार में



अगर मौजें डुबो देतीं तो कुछ तस्कीन हो जाती

किनारों ने डुबोया है मुझे इस बात का ग़म है

तस्कीन – सांत्वना



अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे

तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे



इलाही एक ग़म – ए – रोज़गार क्या कम था

कि इश्क़ भेज दिया जान – ए – मुब्तला के लिए

ग़म – ए – रोज़गार – जीविका का दुख




कर रहा था ग़म – ए – जहाँ का हिसाब

आज तुम याद बे – हिसाब आए



कौन किसी का ग़म खाता है

कहने को ग़म – ख़्वार है दुनिया




किस तरह अपनी मोहब्बत की मैं तकमील करूँ

ग़म – ए – हस्ती भी तो शामिल है ग़म-ए-यार के साथ



कोई इक ज़ाइक़ा नहीं मिलता

ग़म में शामिल ख़ुशी सी रहती है 



क्या कहूँ किस तरह से जीता हूँ

ग़म को खाता हूँ आँसू पीता हूँ


Urdu Shayari For Love 


क़ैद – ए – हयात ओ बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं

मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँ 



क़िस्सा – ए – मजनूँ पसंद – ए – ख़ातिर जानाना है

वर्ना ख़्वाब – आवर तो अपने ग़म का भी अफ़्साना है 



उल्फ़त का है मज़ा कि असर ग़म भी साथ हों

तारीकियाँ भी साथ रहें रौशनी के साथ 




उन का ग़म उन का तसव्वुर उन के शिकवे अब कहाँ

अब तो ये बातें भी ऐ दिल हो गईं आई गई

शिकवे – शिकायत 




उन का ग़म उन का तसव्वुर उन की याद

कट रही है ज़िंदगी आराम से

तसव्वुर – कल्पना 




उसे भी जाते हुए तुम ने मुझ से छीन लिया

तुम्हारा ग़म तो मिरी आरज़ू का ज़ेवर था 




ग़म अगरचे जाँ-गुसिल है प कहाँ बचें कि दिल है

ग़म – ए – इश्क़ गर न होता ग़म – ए – रोज़गार होता

अगरचे – हालांकि 




ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ न महसूस हो जहाँ

मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया 




ग़म अज़ीज़ों का हसीनों की जुदाई देखी

देखें दिखलाए अभी गर्दिश – ए – दौराँ क्या क्या 




ग़म दे गया नशात – ए – शनासाई ले गया

वो अपने साथ अपनी मसीहाई ले गया

मसीहाई – मसीह की चमत्कारी शक्तियां



ग़म है आवारा अकेले में भटक जाता है

जिस जगह रहिए वहाँ मिलते – मिलाते रहिए 

रहिए – रहना




ग़म की तौहीन न कर ग़म की शिकायत कर के

दिल रहे या न रहे अज़मत-ए-ग़म रहने दे

अज़मत-ए-ग़म – दुख की महिमा





ग़म मुझे देते हो औरों की ख़ुशी के वास्ते

क्यूँ बुरे बनते हो तुम नाहक़ किसी के वास्ते 




ग़म मुझे ना – तवान रखता है

इश्क़ भी इक निशान रखता है

ना – तवान – कमज़ोर 



ग़म से एहसास का आईना जिला पाता है

और ग़म सीखे है आ कर ये सलीक़ा मुझ से 





ग़म से नाज़ुक ज़ब्त – ए – ग़म की बात है

ये भी दरिया है मगर ठहरा हुआ

ज़ब्त – ए – ग़म – सहनशीलता





ग़म से निस्बत है जिन्हें ज़ब्त – ए – अलम करते हैं

अश्क को ज़ीनत – ए – दामाँ नहीं होने देते 





ग़म – ए – हबीब नहीं कुछ ग़म – ए – जहाँ से अलग

ये अहल – ए – दर्द ने क्या मसअले उठाए हैं

vishal

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